महाविद्यालय का संक्षिप्त इतिहास...(About Us)

मेरा नाम मारवाड़ी काॅलेज, किशनगंह है मैं किशनगंज रेलवे स्टेशन से लगभग 4 किलोमीटर पश्चिम किशनगंज-बहादुरगंज पथ के किनारे अवस्थित हूँ। बांगलादेश और नेपाल की अंतर्राष्ट्रीय सीमाओं से सटा यह क्षेत्रा अपनी बहुलतावादी सामाजिक संरचना की बजह से अन्य स्थानों से थोड़ा विशिष्ट है सामाजिक सांस्कृतिक सामरस्य के आस्वाद से भरपूर। परंतु केन्द्र से बाहर दूर परिध् िपर स्थित होने के कारण इस शहर की अपनी समस्याएँ भी रही हैं। मुख्यधरा की तमाम उपलब्ध्यिों से जोड़ने और जुड़ने के वैश्विक दवाब तले अब यह आवश्यक हो गया है कि उन गतिरोधें को तोड़कर नई पहल हो, जिससे नया उजास पफैले।

मेरे नामकरण की अपनी अलग कहानी है। यह नाम मुझे किशनगंज के मारवाड़ी समाज द्वारा दिया गया है। जिस रूप में मुझे आज देखा जा रहा है, वहाँ तक पहुँचने में मुझे एक लम्बी और संघर्षपूर्ण यात्रा तय करनी पड़ी है। मेरी जिन्दगी की कहानी भी लम्ब संघर्षो की कहानी है। अपने जन्म से लेकर आज तक मुझे एक लम्बे संघर्ष के दौर से गुजरना पड़ा है। मुझे ठीक तरह से मालूम नहीं कि पहली बार मैं किस व्यक्ति के दिमाग की कोख में बीज रूप में आया। कुछ लोगों को कहते सुना है कि मेरी रूपरेखा पहली बार एक शिक्षक के दिमाग में तैयार हुई। पिफर कुछ और लोगों की राय है कि पहली बार मेरी तस्वीर का खाका कुछ छात्रों के दिमाग में उभरा था। पफलतः उस आदमी का नाम बता पाना मेरी याददाश्त से बाहर जा रहा है, जिसके दिमाग में रूपरेखा का अंकुर पफूटा।

मेरी स्थापना की बुनियाद कुल जमा सात सौ रूप्ये से डाली गयी थी। ये रूप्ये कुल उत्साही नौजवानों के जरिए चंदा स्वरूप् जमा किये गये थे। चंदा वसूली की शुरूआत स्व. लखन लाल कपूर के नेतृत्व में हुई थी, जो बाद में चलकर महाविद्याालय प्रबंध् समिति के अध्यक्ष और भरतीय संसद के सदस्य भी निर्वाचित हुए। इस समिति के प्रथम सचिव थे स्व. पृथ्वी चंद मोदी। कुछ समय बाद प्रबंध् समिति का पदभार स्व. नंद लाल प्रसाद को सौंपा गया और वे लम्बी अवध् ितक इस पद की जिम्मेदारी का निर्वहन करते रहे। तत्पश्चात् सचिव पद की जिम्मेदारी स्व. रावत मल अग्रवाल ने संभाली, जिन्के समय में मुझे आर्थिक मजबूती हासिल हुई। मेरे शासी निकाल के अंतिम सचिव थे अनुमंडलाध्किारी श्री सरोजानन्द चैध्री।

अपने जन्म की तारीख मुझे मालूम है। 23 अगस्त का दिन था और साल था 1960 ई.। अगस्त का महीना भारत के इतिहास में स्वातंत्रय प्राप्ति के गर्व से गौरवान्वित है। पफलतः इस स्वातंत्रय माह में जन्म ग्रहण करने का मुझे अपने आप पर गर्व है। मेरे जन्म के बाद मुझे लावारिस छोड़ दिया गया। मेरी देख भाल करने वाला कोई नहीं था। अपनी कहने को मेरे पास दो गज जमीन भी नहीं थी और न सिर छिपाने के लिए एक झोपड़ी ही नसीब थी। मेरी न तो अपनी कोई पहचान थी और न अपना कोई वजूद ही। उचित पालन-पोषण के अभाव में नवजात मैं मौत का इन्तजार ही कर रहा था कि कुछ दयावानों की नजर मुझे पर पड़ी और उन्होंने मेरे पालन-पोषण की जिम्मेदारी उठा ली। वे सहदय इंसान थे स्व. नन्द लाल प्रसाद. स्व. रावतमल अग्रवाल, स्व. विश्वम्भर मंत्राी. स्व. हनुमान बख्श जालान और स्व. रामेश्वर प्रसाद।

प्रतिष्ठित केसरी परिवार के रामचरित एवं हरिहर प्रसाद ने करीब 54 बीघे जमीन देकर मेरे ठौर-ठिकाने का इंतजाम किया और इन्हीं लोगों की उदारता से विस्तृत सरजमीन पर मेरा अस्तित्व कायम हो सका। 1963 ई. में औरंभा सुन्दरी दासी ने भी 22.73 एकड़ जमीन मुझे देकर शिक्षा के विकास में महत्तर भूमिका निभायी। इनके अलावे उमेदा खातुन एवं अनेक स्वनामध्न्य लोगों ने भी जमीन देकर मेरे परिक्षेत्रा को व्यापक स्वरूप् प्रदान किया। अब मेरे पालन-पोषण के लिए आर्थिक साध्नों की आवश्यकता थी और ये आसानी से उपलब्ध् नहीं थे। पिफर कुछ उत्साही लोग आये और मेरे निमित्त ध्न इकट्ठा करने हेतु झोली उठा ली। मुझे जिंदा रखने के लिए जिन लोगों ने झोली उठाई थी, थकान महसूस करते हुए इन्हीं झोली उठाने वालों ने शहर के कुछ लोगों को इकट्ठा किया और झोली उनके समक्ष रख दी। भीड़ में खामोशी थी, चारों ओर सन्नाटा छाया था। मेरी कीमत लगा दी गई मगर कोई खरीददार आगे नहीं आया। मुझे अपनी बुनियाद हिलती दिखाई दी थी। अंततः मुझे मारवाड़ी समाज के हवाले कर दिया गया। मारवाड़ी समाज ने मेरे लिए पचास हजार रूप्ये देने का एलान किया, साथ ही शर्त भी लगा दी कि मेरा नाम ‘‘मारवाड़ी काॅलेज’’ कर दिया। प्रारंभ में मेरा नाम ‘‘किशनगंज डिग्री काॅलेज’’ था। विश्वविद्याालय सुरक्षा कोष के लिए वांछित पचास हजार रूप्ये की खातिर मेरा नाम बदलकर ‘‘मारवाड़ी काॅलेज, किशनगंज’’ कर दिया गया। प्रारंभ के छः वर्षों तक मुझे किशनगंज उच्च विद्यालय मे बतौर मेहमान रखा गया। पिफर मेरे लिए भवन के इंतजाम की प्रक्रिया शुरू हुई। कापफी प्रयास के बाद जमा हुए 28486.00 रूपये से मेरी इमारत की बुनियाद संभव हो सकी। लगभग पचास वर्ष पूर्व मेरी स्थापना कुल 58 छात्रों से हुई थी और इस समय मेरे छात्रा/छात्राओं की तायदाद लगभग पाँच हजार है। 1961 में मुझे भागलपुर विश्वविद्यालय के अध्ीन किया गया। ध्ीरे-ध्ीरे मैं स्वयं चलने की स्थिति में पहुँचा। सन् 1972 में मुझे भागलपुर विश्वविद्यालय से अलग कर ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय से जोड़ दिया गया। सन् 1975 में मेरा अंगीभूतीकरण हुआ और मैं भूपेन्द्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय मध्ेपुरा के अस्तित्व में आने के समय से ही उसकी आंगिक इकाई बना हूँ। मेरे अंगीभूतीकरण की विध्वित औपचारिकता 06 पफरवरी 1976 को पूरी हूई एवं 01.04.1975 से ही अंगीभूतीकरण किया गया। इसके बाद मेरी जिन्दगी में नई रफ्रतार आई। मेरा चरण( विकास प्रारंभ हुआ। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग एवं बिहार सरकार के सहयोग से छात्रावास भवन का निर्माण हुआ और छात्रों के रहने की अच्छी व्यवस्था कायम हुई। गत वर्ष राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा अभियान ;रूसाद्ध के तहत सरकारी कोष से मेरे परिसर में सुसज्जित स्मार्ट क्लास रूप एवं कम्प्यूटरीकृत लैंग्वेज लैब का नब निर्माण हुआ है।

मेरी स्थापना के बारह साल बाद अंतरस्नातक विज्ञान की पढ़ाई की स्वीकृति विश्वविद्यालय से प्राप्त हुई। स्नातक कला कक्षा में सम्मान की पढ़ाई की स्वीकृति 1975-77 में मिल ीवह भी एकमात्रा अर्थशास्त्रा विषय में। पिफर इतिहास, दर्शनशास्त्रा और उर्दू में प्रतिष्ठा की स्वीकृति मिली। स्नातक विज्ञान की स्वीकृति कुछ वर्षो के बाद हुई।